हरिद्वार,उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा अंतरराष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलन का शुभारंभ

0
6

उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय, विदेश मंत्रालय, भारत सरकार तथा केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलन का उद्घाटन सत्र संस्कृत अकादमी के प्रेक्षागृह में आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में सर्वप्रथम प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का विशेष कार्यक्रम ‘मन की बात’ का प्रसारण किया गया। उसके बाद विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों द्वारा स्वागत गान के माध्यम से अतिथियों का स्वागत किया गया। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. दिनेश चंद्र शास्त्री द्वारा मंचासीन अतिथियों, समस्त अतिथियों तथा प्रतिभागियों का वाचिक स्वागत किया गया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने कहा कि संस्कृत साहित्य की जिस धारा का प्रवाह वेद है, जिसकी पवित्र गोद में बैठकर संस्कृत साहित्य पल्लवित पुष्पित हुआ और नवयौवन रुप में विकसित हो रहा है, उस श्रेष्ठ भाषा का उद्गम स्थल भारत आज सम्पूर्ण विश्व को नई राह दिखा रहा है। उन्होंने बताया कि रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों में सामाजिक जीवन के जिन उदात्त तत्वों का विवेचन किया गया है, उसकी प्रासंगिकता आज भी ज्यों की त्यों बरकरार है। डॉ. रावत ने बताया कि संस्कृत भाषा से निकली स्वारांजली जहां मनुष्य को आध्यात्मिक श्रेष्ठता के उन्नत शिखर पर प्रतिस्थापित करने में सक्षम है, वहीं सृष्टि में उत्पन्न प्रत्येक रचना को उसके उत्तम स्वरूप में गढ़ने का कार्य भी संस्कृत भाषा ने किया है। वर्तमान वैश्विक जगत् की कोई भी ऐसी समस्या नहीं जिसका समाधान संस्कृत साहित्य में न हो।

कार्यक्रम के अति विशिष्ट अतिथि तथा पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व राज्यपाल श्री भगत सिंह कोश्यारी ने कहा किअंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में आयोजित किए जाने वाले 18 तकनीकी सत्र श्रीमद् भागवत गीता के 18 अध्याय के समकक्ष होंगे। उन्होंने संस्कृत अनुरागियों एवं शोधार्थियों से यह अपील की कि वे सभी एक साथ मिलकर संस्कृत के संवर्धन में अपना योगदान दें ताकि आने वाले समय में संस्कृत पूरे देश की राष्ट्रभाषा तथा उत्तराखंड राज्य की प्रथम राजभाषा बन सके। उन्होंने बताया कि संस्कृत भाषा का प्रभाव केवल भारत देश की परिधि तक सीमित नहीं है अपितु यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी गहरी छाप छोड़ता है, जिस पर गहन शोध किए जाने की आवश्यकता है। भारतीय ज्ञान परम्परा आधुनिक विज्ञान के विभिन्न पक्षों को बहुत गहनता एवं गंभीरता से समाहित करती है, जिस पर शोध किए जाने की आवश्यकता है। संस्कृत का अध्ययन मानव जीवन में अनुकरणीय संस्कारों को उत्पन्न करता है। उन्होंने समस्त विद्यार्थियों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बारीकियों को समझते हुए उसे अपनाने की अपील की।

कार्यक्रम की विशिष्ट अतिथि डॉ. नीना मल्होत्रा, सचिव विदेश मंत्रालय ने कहा कि मां गंगा के इस पावन तट पर हो रहे इस संस्कृत के अद्भुत समागम को देखकर सभी अभिभूत हैं। देववाणी संस्कृत के भीतर मन को परिष्कृत करने की अद्भुत क्षमता है। डॉ. मल्होत्रा ने कहा कि संस्कृत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक सम्मानित भाषा है। भारतीय संस्कृति और संस्कृत भाषा का प्रचार प्रसार पूर्व से विदेशों में होता रहा है। उन्होंने बताया कि भारतीय ज्ञान प्रणाली में आधुनिक विज्ञान के अनेक सिद्धांत पूर्व से ही विद्यमान हैं। आज भारतीय ज्ञान परंपरा पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से चिंतन करने की आवश्यकता है ताकि संपूर्ण विश्व भारत के गौरवशाली इतिहास एवं परंपरा से परिचित हो सके।

कार्यक्रम के सारस्वत अतिथि एवं संस्कृत शिक्षा सचिव श्री दीपक गैरोला ने बताया कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं है अपितु यह वैज्ञानिक चेतना एवं अध्यात्मिक दर्शन का आधार है। उन्होंने कहा कि इस सम्मेलन में विभिन्न देशों से पधारे अतिथियों की उपस्थिति यह प्रमाणित करती है कि संस्कृत केवल भारत की भाषा नहीं अपितु यह संपूर्ण विश्व की भाषा है तथा यह संपूर्ण विश्व को एक सूत्र में पिरोने में सक्षम है। श्री दीपक कुमार ने बताया कि आज स्वार्थ, संघर्ष और विभाजन के दौर में संस्कृत हमें करुणा, संवाद, संतुलन और विश्व कल्याण का मार्ग दिखाती है, इसलिए वैश्विक शांति और सहयोग की दृष्टि से संस्कृत का दार्शनिक दृष्टिकोण महत्वपूर्ण हो जाता है।

कार्यक्रम के अध्यक्ष एवं क्षेत्रीय विधायक श्री आदेश चौहान ने कहा कि संस्कृत भाषा ने एक लंबी अवधि तक उपेक्षा का दंश झेला है। परंतु वर्तमान समय में माननीय प्रधानमंत्री जी के कुशल नेतृत्व में संस्कृत का मान सम्मान केवल राष्ट्रीय स्तर पर नहीं अपितु अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समृद्ध हो रहा है। उन्होंने बताया कि इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में विद्वतजन के शोध वाचन एवं विमर्श से जो ज्ञान रूपी अमृत निकलेगा, उससे संस्कृत का वृहद स्तर पर संवर्धन एवं प्रचार प्रसार होगा।

इस अवसर पर डॉ. श्वेता अवस्थी एवं डॉ. सुमन भट्ट द्वारा संपादित तथा डॉ. प्रकाश चंद्र पंत द्वारा अनूदित दो पुस्तकों का मंचासीन अतिथियों द्वारा विमोचन किया गया।

विदेश से पधारे विभिन्न संस्कृत विशेषज्ञों का माननीय संस्कृत शिक्षा मंत्री सहित मंचासीन अतिथियों द्वारा स्वागत एवं सत्कार किया गया, जिनका नाम इस प्रकार है- स्वामी संयुक्तानंद – फ़िजी, पंकजाक्ष माधवदास – बहरीन, स्वामी सत्प्रकाशानंद सरस्वती- मलेशिया, लुवसंदोरज त्सेत्से – मंगोलिया, सानित सीनक- थाईलैण्ड, डॉ० इलिया टार्कन- बेलारूस, डॉ० मारसिस गैसुन्स- रुस, डॉ० असंग तिलकरत्ने- श्रीलंका, ऐत्जानोवा असील- कज़ाखस्तान, डॉ० दिवाकर शुक्ल – यूनाईटेड किंगडम आदि का सम्मान किया गया। कार्यक्रम के अंत में विश्वविद्यालय के कुलसचिव दिनेश कुमार ने अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापित किया । इस अवसर पर विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर राम खण्डेलवाल, डॉ. उमेश शुक्ल, डॉ. विनय सेठी, डॉ. अजय परमार, प्रोफ़ेसर विन्दुमती द्विवेदी, प्रोफ़ेसर अरविंद मिश्र, प्रोफ़ेसर दिनेशचन्द्र चमोला, संस्कृत अकादमी के सचिव प्रोफ़ेसर मनोज किशोर पन्त , संस्कृत शिक्षा के सहायक निदेशक डॉ० वाजश्रवा , कर्मचारी बंधु एवं अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here